कलेक्टर को गुमराह कर खनिज विभाग ने की अवैध उतखनन के पत्थर को वैध करने की तैयरी....
कलेक्टर को गुमराह कर खनिज विभाग ने की अवैध उतखनन के पत्थर को वैध करने की तैयरी....
एस डी एम ने सयुंक्त कार्यवाही कर लीज से वहार अवैध उतखनन करने वाली खदानों को किया था सील अब री-इन्वेस्टिगेशन के नाम पर लाखो करोड़ों रूपये के अवैध उत्खनन को 'वैध' बनाने की है तैयारी•••?
शिवपुरी। जिले के सतनवाड़ा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले डोगरी और बम्हारी के जंगलों में इन दिनों नियम-कानूनों को ताक पर रखकर खनिज संपदा की सरेआम लूट मची है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस खेल में रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। खनिज विभाग की कथित 'सुस्ती' और अब 'री-इन्वेस्टिगेशन' के दांव ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लीज की आड़ में वन भूमि पर 'सर्जिकल स्ट्राइक'
सतनवाड़ा के डोगरी और बम्हारी में खनिज विभाग के द्वारा नरेश गुर्जर को एक, अशोक शर्मा को दो और राजेंद्र गुप्ता भौती वालों को एक खदान पत्थर फर्सी के उत्खनन के लिए लीज आवंटित की गई थी। लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही निकली। इन लीज मालिकों ने अपनी निर्धारित सीमा को लांघकर वन विभाग और राजस्व की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा किया और वहां से लाखों करोड़ों रुपये की पत्थर फर्सी निकाल ली। सूत्रों की मानें तो मूल लीज क्षेत्र में अब पत्थर बचा ही नहीं है, जिसके कारण लीज संचालक अब सरकारी और वन भूमि को छलनी कर रहे हैं।
वन विभाग के 10 पत्रों को डस्टबीन में क्यों डाला खनिज विभाग ने•••?
इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक पहलू खनिज विभाग का रवैया रहा है। सतनवाड़ा वन विभाग ने अवैध उत्खनन को देखते हुए खनिज विभाग को एक-दो नहीं, बल्कि करीब 10 पत्र लिखे। रेंजर चिल्लाते रहे कि जंगल कट रहा है, जमीन खोदी जा रही है, लेकिन खनिज विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सवाल यह है कि आखिर विभाग इन रसूखदार खनन माफियाओं पर मेहरबान क्यों था••?
जब SDM की टीम ने पकड़ा 'चोरी का माल'
खनिज विभाग की निष्क्रियता के बाद SDM आनंद रजावत ने राजस्व, वन और माइनिंग विभाग की संयुक्त टीम के साथ जब बम्हारी और डोगरी में दबिश दी, तो वहां का नजारा देख अधिकारी भी दंग रह गए। लीज क्षेत्र से बाहर लाखों रुपये की पत्थर फर्सी का अवैध भंडारण मिला। सरकारी जमीन को गहरे जख्म दिए गए थे। आनन-फानन में टीम ने खदानों को सील कर दिया और अवैध उत्खनन की पुष्टि हुई।
री-इन्वेस्टिगेशन: अवैध उतखनन को वैध बनाने की निंजा टेक्निक
अब इस मामले में एक नया और संदिग्ध मोड़ आया है। दो महीने तक मामला ठंडा पड़ने का इंतजार किया गया और अब खनिज विभाग ने लीज संचालकों को कलेक्टर के यहां 'री-इन्वेस्टिगेशन' (पुन: जांच) के लिए आवेदन लगाने की 'सलाह' दी जिसमे दलील दी गई की कार्यवाही के समय लीज संचालक मौके पर मौजूद नहीं था वही कार्यवाही के दौरान शाम हो गई थी “अब सवाल यह उठता है कि क्या विभाग अगले दिन जाकर जाँच नहीं कर सकता था या फिर उस दिन से सूरज नहीं निकला और अभी तक रात ही हो रही है•••? यदि जांच में कोई त्रुटि थी, तो उसी समय संचालक ने आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई गई••? आपत्ति में दो माह का समय क्यों लगा••? क्या इन दो महीनों में अवैध रूप से निकाले गए पत्थर को लीज क्षेत्र के भीतर शिफ्ट करने का समय दिया गया••? अब इस मामले में यही हुआ है कि दो महीने में अन्य क्षेत्रों से उत्खनन किए गए पत्थर पर्सी को अब लीज़ क्षेत्र में इकट्ठा करके शिफ़्ट कर लिए गए हैं।
री इन्वेस्टिगेशन मैं वही पुराने अधिकारी क्यों?
जांच की जिम्मेदारी फिर उन्हीं अधिकारियों (SDM, खनिज अधिकारी, इंस्पेक्टर) को दी गई है जिन्होंने पहले जांच की थी। क्या यह पुरानी जांच को ही झुठलाने की साजिश है••? “तर्क दिया जा रहा है कि पहली जांच के समय खदान संचालक वहां नहीं थे और रात हो गई थी। क्या रात के अंधेरे में सरकारी जमीन पर हुआ गड्ढा दिन के उजाले में लीज क्षेत्र के अंदर चला जाएगा•••?
क्या सेटिंग से 'अवैध पत्थर पर्सी बनेगा 'वैध'?
आरोप लग रहे हैं कि लाखों रुपये के 'लेन-देन' के दम पर इस री-इन्वेस्टिगेशन का खेल रचा गया है। योजना बेहद सरल है: दो महीनों में जो पत्थर वन भूमि से निकला था, उसे अब लीज क्षेत्र के ढेर में दिखा दिया जाएगा। नई जांच रिपोर्ट में इसे 'निराधार' बताकर सील खोल दी जाएगी और करोड़ों का पत्थर बाजार में खपा दिया जाएगा। डोंगरी खदान की जांच का आवेदन भी अभी पाइपलाइन में है, जिससे साफ है कि माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। अगर प्रशासन ने इस बार ईमानदारी से काम नहीं किया, तो सतनवाड़ा के जंगल सिर्फ कागजों पर रह जाएंगे।
