शिवपुरी का ‘भावांतर खेल’: गुनहगार पटवारी, बलि का बकरा बना मंडी सचिव•••

 


शिवपुरी का ‘भावांतर खेल’: गुनहगार पटवारी, बलि का बकरा बना मंडी सचिव••• 

कलेक्टर साहब की ‘अजब’ इंसाफ की गजब कहानी; तहसीलदार की रिपोर्ट दरकिनार, रसूखदारों को बचाने के लिए सचिव की छुट्टी•••? 

शिवपुरी | मध्य प्रदेश का शिवपुरी जिला एक बार फिर भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। दिसंबर 2025 में जब आम किसान मंडियों के चक्कर काट रहा था, तब राजस्व विभाग के कुछ 'कलाकारों' ने बंद कमरों में बैठकर करोड़ों की भावांतर योजना को पलीता लगा दिया। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहाँ 'विलेन' कोई और है, लेकिन सलाखों के पीछे 'बेगुनाह' को धकेला जा रहा है। भावांतर योजना का नियम सीधा है—जिसके पास जमीन होगी, वही सोयाबीन बेचेगा और अंतर की राशि पाएगा। लेकिन शिवपुरी और बैराड़ में 'चमत्कार' हुआ।पटवारियों ने उन लोगों के नाम सत्यापित (Verified) कर दिए जिनके पास एक बिस्वा जमीन भी नहीं थी।शिवपुरी के 15 और बैराड़ के 13 'भूतिया किसानों' ने सरकारी पोर्टल पर सेंधमारी की। कागजों में लहलहाती फसल दिखाई गई और असली किसान हाथ मलता रह गया।

तहसीलदार की रिपोर्ट: जब 'सच्चाई' ने दस्तक दी

मामला गरमाया तो जांच बैराड़ तहसीलदार दृगपाल सिंह वेश्य को सौंपी गई। तहसीलदार ने 11 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जो किसी बम धमाके से कम नहीं थी। रिपोर्ट में सीधे तौर पर संबंधित पटवारी और कंप्यूटर ऑपरेटर को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही थी कि अगर पटवारी गलत सत्यापन नहीं करता, तो घोटाला मुमकिन ही नहीं था।

3. कलेक्टर का 'मास्टरस्ट्रोक' या अपनों को बचाने की ढाल•••?

यहीं से कहानी में सबसे बड़ा 'ट्विस्ट' आता है। जिले के कप्तान, कलेक्टर रविंद्र कुमार चौधरी के पास जब दोषियों पर कार्रवाई की फाइल पहुंची, तो उम्मीद थी कि भ्रष्ट पटवारियों पर गाज गिरेगी। लेकिन हुआ इसके उलट कलेक्टर साहब ने अपने राजस्व अमले (पटवारियों) को क्लीन चिट जैसी चुप्पी दी और सारा दोष मंडी सचिव रामकुमार शर्मा के मत्थे मढ़ दिया। एमडी मंडी को एक ऐसा प्रतिवेदन भेजा गया जिसने सीधे सचिव की कुर्सी हिला दी। नतीजा••? रामकुमार शर्मा सस्पेंड होकर घर बैठ गए।

जनता के बीच सुलगते सवाल: क्या यह 'राजस्व' को बचाने की सेटिंग है•••? 

शिवपुरी की जनता और किसान संगठन अब प्रशासन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। मंडी सचिव का काम फसल की नीलामी देखना है, न कि यह जांचना कि जमीन किसकी है। यह काम तो राजस्व विभाग का था तहसीलदार की स्पष्ट रिपोर्ट के बावजूद पटवारियों पर एफआईआर (FIR) क्यों नहीं हुई•••? “क्या जिले के बड़े अफसरों ने अपने विभाग की साख बचाने के लिए दूसरे विभाग के अधिकारी की बलि चढ़ा दी•••? यह घोटाला सिर्फ चंद लोगों का नहीं है, बल्कि इसमें एक बड़ा नेक्सस (सांठगांठ) काम कर रहा है। अगर निष्पक्ष जांच हुई तो कई सफेदपोश चेहरे बेनकाब होंगे।" — एक स्थानीय किसान प्रतिनिधि फिलहाल, मंडी सचिव सस्पेंड हैं, पटवारी अपने काम पर डटे हैं और कंप्यूटर ऑपरेटर मुस्करा रहे हैं। शिवपुरी का यह भावांतर घोटाला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक गहरा धब्बा है। देखना यह है कि क्या प्रदेश की सरकार इस 'प्रशासनिक पक्षपात' पर संज्ञान लेती है या फिर 'बलि का बकरा' ही इस कहानी का अंत माना जाएगा•••? 


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