शराब के खिलाफ महिलाओं का उग्र आंदोलन, दूसरी ओर ठेकेदारों में दहशत
शराब के खिलाफ महिलाओं का उग्र आंदोलन, दूसरी ओर ठेकेदारों में दहशत
भौंती थाने के सामने शराब की पेटियां फेंकने का आरोप, थरखेड़ा-सिरसौद-खोड़-मनपुरा में लूट, मारपीट और आगजनी के दावे; सुरक्षा नहीं मिली तो दुकानें बंद करने की चेतावनी
शिवपुरी | रिपोर्ट दीपक विकट | 10 सितंबर 2026
शिवपुरी जिले में शराब और नशे को लेकर पिछले पांच दिनों से हालात लगातार गरमाते जा रहे हैं। एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं शराब के खिलाफ सड़कों पर उतरकर दुकानों को बंद कराने और शराबबंदी की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शराब दुकानों के लाइसेंसी ठेकेदारों ने दुकानों में कथित लूटपाट, तोड़फोड़, मारपीट और कर्मचारियों को धमकाने के आरोप लगाते हुए प्रशासन से सुरक्षा की मांग की है। दोनों पक्षों के आरोपों ने अब पुलिस, आबकारी विभाग और प्रशासन के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
मनपुरा, अमोलपठा, नया अमोल, सिरसौद सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने पैदल मार्च निकालकर नशे के खिलाफ आवाज बुलंद की। कई स्थानों पर महिलाएं हाथों में लाठी-डंडे लेकर भी विरोध प्रदर्शन करती नजर आईं। महिलाओं का कहना है कि शराब के कारण परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है, घरेलू विवाद बढ़ रहे हैं और युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है।
भौंती थाने के सामने शराब की पेटियां फेंकने का आरोप
भौंती थाना क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन के दौरान महिलाओं द्वारा कथित अवैध शराब की दुकानों से शराब उठाकर थाने के सामने फेंकने और तोड़फोड़ किए जाने की बात सामने आई है। घटना के बाद मौके पर हंगामे की स्थिति बनी।
महिलाओं ने प्रशासन और आबकारी विभाग से ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने तथा शराब कारोबार में संलिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
महिलाओं का कहना है कि मजदूरी से मिलने वाले सीमित पैसों में भी परिवार के पुरुषों द्वारा बड़ी रकम शराब में खर्च कर दी जाती है। उनका आरोप है कि इससे घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च प्रभावित होते हैं। कुछ महिलाओं ने शराब के कारण परिवारों के बिखरने और महिलाओं के विधवा होने तक की पीड़ा भी सामने रखी है।
‘लाड़ली बहना’ की राशि नहीं, घर में शराब बंद चाहिए
आंदोलन कर रही महिलाओं में सरकार की योजनाओं को लेकर भी अलग तरह का संदेश सामने आया है। कुछ महिलाओं का कहना है कि उन्हें आर्थिक सहायता से ज्यादा जरूरत ऐसे माहौल की है, जिसमें उनके परिवार शराब से बर्बाद न हों।
महिलाओं का तर्क है कि महंगाई के दौर में मजदूरी से मिलने वाले करीब 500 रुपये में से यदि परिवार का पुरुष हिस्सा शराब में खर्च कर देता है तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि महिलाओं का आंदोलन केवल शराब की दुकानों को बंद कराने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि यह परिवार की आर्थिक सुरक्षा और बच्चों के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
सागर की घटना के बाद शिवपुरी में तेज हुआ विरोध
सागर में शराब से जुड़ी घटना के बाद नशे के खिलाफ उठी आवाज का असर शिवपुरी के ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। नया अमोल सहित कई गांवों में महिलाओं ने स्वयं आगे आकर विरोध शुरू किया और धीरे-धीरे यह आवाज आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचती गई।
इस आंदोलन की खास बात यह है कि फिलहाल यह किसी राजनीतिक दल के झंडे या औपचारिक संगठन के नेतृत्व में संचालित होता दिखाई नहीं दे रहा। महिलाएं स्वयं आगे आकर शराब के खिलाफ आवाज उठा रही हैं।
हालांकि प्रशासन के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि शांतिपूर्ण विरोध और कानून हाथ में लेने के बीच अंतर स्पष्ट रहे। शराब के खिलाफ जनआक्रोश अपनी जगह है, लेकिन किसी दुकान में तोड़फोड़, आगजनी या लूट की पुष्टि होने पर कानून के तहत कार्रवाई भी आवश्यक होगी।
दूसरी ओर ठेकेदारों का आरोप—दुकानें निशाने पर, कर्मचारी भयभीत
महिलाओं के आंदोलन के समानांतर शराब लाइसेंसी ठेकेदारों ने भी प्रशासन के सामने अपनी परेशानी रखी है। ठेकेदार विवेक शिवहरे, सचिन, कॉमेश, देवेंद्र शिवहरे, महेंद्र राय सहित अन्य ठेकेदारों ने कलेक्टर को शिकायत देकर दुकानों और कर्मचारियों की सुरक्षा की मांग की है।
ठेकेदारों का आरोप है कि थरखेड़ा, सिरसौद, खोड़ और मनपुरा की कम्पोजिट मदिरा दुकानों में कथित लूटपाट, मारपीट और आगजनी जैसी घटनाएं हुई हैं। उनका कहना है कि लगातार विरोध और घटनाओं के कारण कर्मचारियों में भय बना हुआ है।
भौंती की दुकान से 325 पेटी शराब ले जाने का दावा
ठेकेदारों की शिकायत के अनुसार 10 सितंबर की सुबह करीब 10 से 11 बजे बड़ी संख्या में लोग दुकान पर पहुंचे। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भीड़ द्वारा दुकान में रखी शराब कथित रूप से उठा ली गई।
ठेकेदारों ने दुकान में करीब 200 पेटी प्लेन शराब, 100 पेटी बीयर और 25 पेटी स्प्रिंट का स्टॉक होने का दावा किया है। हालांकि वास्तविक रूप से कितनी शराब दुकान से ले जाई गई, इसकी पुष्टि पुलिस और आबकारी विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
शिकायत में दुकान पर मौजूद सेल्समैन हरप्रसाद राय और राजेंद्र शिवहरे के संबंध में कहा गया है कि भीड़ को देखकर वे भयभीत होकर एक तरफ हो गए। ठेकेदारों का आरोप है कि कर्मचारियों को दुकान दोबारा खोलने पर जान से मारने की धमकी भी दी गई।
‘सुरक्षा नहीं मिली तो चाबियां सौंप देंगे’
लाइसेंसी शराब ठेकेदारों का कहना है कि यदि दुकानों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो मौजूदा परिस्थितियों में कारोबार चलाना मुश्किल होगा। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी है कि सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होने पर वे दुकानों का संचालन बंद कर चाबियां जमा करने जैसे कदम पर विचार कर सकते हैं।
ठेकेदारों ने दुकानों से कथित रूप से ले जाई गई शराब की बरामदगी, सीसीटीवी फुटेज की जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
पुलिस के सामने दोहरी चुनौती
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक तरफ महिलाओं के नशा विरोधी आंदोलन को कानून-व्यवस्था के दायरे में रखते हुए उनकी शिकायतों पर कार्रवाई की जाए और दूसरी तरफ शराब दुकानों में यदि वास्तव में लूट, तोड़फोड़, आगजनी या धमकी की घटनाएं हुई हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच की जाए।
पुलिस को यह भी स्पष्ट करना होगा कि किन स्थानों पर अवैध शराब की बिक्री की शिकायतें मिली हैं, कहां कार्रवाई हुई है और शराब दुकानों से कथित रूप से कितनी शराब ले जाने की पुष्टि हुई है।
आबकारी विभाग के सामने भी कई सवाल
पूरे विवाद ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीण महिलाओं का आरोप है कि गांवों में शराब आसानी से उपलब्ध है, जबकि ठेकेदारों का कहना है कि उनकी वैध दुकानों को ही निशाना बनाया जा रहा है।
ऐसे में आबकारी विभाग के सामने यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संबंधित क्षेत्रों में कितनी वैध शराब दुकानें संचालित हैं, अवैध शराब के खिलाफ कितनी कार्रवाई हुई, कितनी शराब जब्त की गई और महिलाओं द्वारा लगाए जा रहे आरोपों की जांच किस स्तर पर की जा रही है।
सरकार के सामने भी अब बड़ा सवाल
मध्यप्रदेश सरकार लगातार नशे के खिलाफ अभियान और अवैध शराब पर कार्रवाई की बात करती रही है। पुलिस और प्रशासन भी समय-समय पर कार्रवाई करते हैं। इसके बावजूद यदि ग्रामीण महिलाएं सामूहिक रूप से शराब के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर हो रही हैं तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था का भी विषय है।
सरकार के लिए चुनौती यह है कि वैध शराब कारोबार और अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ उन परिवारों की शिकायतों को भी गंभीरता से लिया जाए, जो शराब के दुष्परिणामों से प्रभावित होने का दावा कर रहे हैं।
आखिर आगे व्यवस्था कैसे चलेगी?
शिवपुरी में इस समय तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई दे रही है। एक तरफ महिलाएं कह रही हैं—‘हमें नशामुक्त गांव चाहिए’, तो दूसरी तरफ लाइसेंसी ठेकेदार कह रहे हैं—‘सुरक्षा नहीं मिली तो दुकान चलाना संभव नहीं।’
इन दोनों पक्षों के बीच अब प्रशासन को संतुलित और कानूनसम्मत रास्ता निकालना होगा। महिलाओं की शिकायतों की निष्पक्ष जांच, अवैध शराब पर प्रभावी कार्रवाई, वैध दुकानों की सुरक्षा और दुकानों में हुई कथित लूट-तोड़फोड़ की जांच—इन सभी मोर्चों पर कार्रवाई जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन महिलाओं के बढ़ते नशा विरोधी आक्रोश को प्रभावी कार्रवाई के माध्यम से शांत कर पाएगा और साथ ही शराब ठेकेदारों एवं उनके कर्मचारियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर पाएगा? आने वाले दिनों में पुलिस, आबकारी विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई ही तय करेगी कि शिवपुरी में यह आंदोलन थमता है या एक बड़े नशा विरोधी जनआंदोलन का रूप लेता है।






